खनिजों का अभिशाप-फ्लोराइड का कहर, सोनभद्र के गांवों में धीमा जहर, हजारों जिंदगियां दांव पर,

Ashish Gupta सोनभद्र। उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में खनिज संपदा की चमक के पीछे छिपा है एक खौफनाक अंधेरा—फ्लोराइड युक्त पानी का जहर, जो लाखों लोगों की जिंदगियों को धीरे-धीरे निगल रहा है। जिले के 276 गांवों में दो लाख से अधिक की आबादी इस विषाक्तता की चपेट में है, जहां हड्डियां कमजोर हो रही हैं, रीढ़ झुक रही है, और लोग असमय मौत के मुंह में समा रहे हैं। बच्चों के दांत काले पड़ चुके हैं, नवजातों में विकृतियां उभर रही हैं, और पूरा एक समुदाय दिव्यांगता की मार झेल रहा है। लेकिन अब भी उम्मीद की एक किरण भी नहीं दिखी —सोनभद्र जिलाधिकारी बी.एन. सिंह ने बीते माह मार्च में पड़रछ गांव के औचक निरीक्षण ने समस्या को त्वरित ध्यान दिलाया था, जहां उन्होंने हर घर नल से जल योजना को सक्रिय करने और टैंकर से शुद्ध पानी उपलब्ध कराने के निर्देश दिए थे। लेकिन सोनभद्र के अनेकों विकासखंड के सैकड़ों गांवों को फ्लोराइड से निजात सिर्फ निर्देशों से नहीं राज्य सरकार और केंद्र सरकार के ठोस पहल पर ही संभव है।

रिंकी की दर्दनाक कहानी एक बड़ा उदाहरण
रोहिनवादामर गांव की 25 वर्षीय रिंकी इस फ्लोराइड संकट का जीवंत लेकिन दुखद उदाहरण हैं। वह न चल सकती हैं, न बोल सकती हैं। पूरा दिन जमीन पर लेटे रहना उनकी मजबूरी है। उनका शरीर इतना कमजोर हो चुका है कि चेहरे पर बैठी मक्खियों को भी उड़ा नहीं पातीं। रिंकी के परिवार में पहले मुन्नी और उनके बेटे पप्पू की मौत हो चुकी है—दोनों स्वस्थ थे, लेकिन फ्लोराइड के जहर ने अचानक उनके शरीर को लकवाग्रस्त कर दिया। इलाज के अभाव में वे चले गए। रिंकी की आंखें अब भी उम्मीद से चमकती हैं, लेकिन सवाल है—कब तक? इसी गांव पड़रछ का रोहित मानसिक रूप से अस्वस्थ है। उसका सिर असामान्य रूप से बड़ा है, और वह कुछ मिनटों से ज्यादा खड़ा नहीं रह सकता। बच्चों पर इस जहर का असर और भी भयावह है—शारीरिक और मानसिक विकास रुक गया है, दांत सड़-गल चुके हैं, और हड्डियां टेढ़ी हो रही हैं। यहां से करीब 20 किलोमीटर दूर पड़रछ-पटेलनगर गांव के 60 वर्षीय विजय कुमार शर्मा 2014 से बिस्तर पर हैं। उनका निचला शरीर काम करना बंद कर चुका है, और बिस्तर से बंधी रस्सी ही उनका सहारा है। “यह पानी हमें मार रहा है,” विजय कहते हैं, उनकी आवाज में दर्द और लाचारी साफ झलकती है।

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खनिजों का अभिशाप: भूगर्भ जल में पांच गुना फ्लोराइड
सोनभद्र खनिज अयस्कों से भरपूर है—कोयला, बॉक्साइट और अन्य खनिज यहां की अर्थव्यवस्था का आधार हैं। लेकिन यही खनिज भूगर्भ जल को दूषित कर रहे हैं। कोन, बभनी, म्योरपुर और दुद्धी ब्लॉक के गांवों में फ्लोराइड का स्तर मानक से पांच से छह गुना अधिक है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देशों के बावजूद कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया, और लोग इस जहरीले पानी पर निर्भर हैं। फ्लोराइड की अधिकता से फ्लोरोसिस नामक बीमारी फैल रही है, जो हड्डियों को कमजोर करती है, दांतों को नष्ट करती है, और शरीर को विकृत कर देती है। यहां तक कि कुष्माहा, किरवानी समेत म्योरपुर ब्लॉक के कई गांव इसकी चपेट में हैं।
कचनरवा ग्राम पंचायत की 25,000 आबादी में हजारों ‘फ्लोराइड वाले’ कहलाते हैं। यहां करीब 7,000 लोग प्रभावित हैं, और कई असमय मौतें हो चुकी हैं।

म्योरपुर विकासखंड के स्थानीय पत्रकार जगत नारायण विश्वकर्मा बताते हैं, “रिंहद बांध से सप्लाई पानी को सुरक्षित मानना मुश्किल है। जिलाधिकारी ने खुद स्वीकारा कि सोन नदी का पानी बेहतर होता, लेकिन म्योरपुर, दुद्धी, बभनी क्षेत्रों के लिए यह संभव नहीं। मरकरी, पारा और फ्लोराइड को फिल्टर कर शुद्ध पानी देना सरकार के लिए चुनौती है।”

नवजातों तक पहुंचा संकट: एक पूरी पीढ़ी खतरे में
फ्लोराइड का असर अब नवजात शिशुओं पर भी दिख रहा है—जन्मजात विकृतियां, कमजोर हड्डियां और मानसिक अस्वस्थता। गांववासी बताते हैं कि बच्चे कुछ सालों में ही दिव्यांग हो जाते हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की कमी इस समस्या को और बढ़ा रही है—न पर्याप्त डॉक्टर, न दवाइयां। प्रभावित लोग कहते हैं, “हमारा पानी हमें मार रहा है, लेकिन सुनने वाला कोई नहीं।”

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जिलाधिकारी का निरीक्षण, समाधान की उम्मीद के ओर एक नजर
इस संकट पर जब जिला प्रशासन की नजर पड़ी तो जिलाधिकारी बी.एन. सिंह ने पड़रछ गांव का औचक निरीक्षण किया। घर-घर जाकर उन्होंने लोगों से बात की और पेयजल की स्थिति का जायजा लिया। जल निगम के अधिकारियों को निर्देश देते हुए उन्होंने कहा, “हर घर नल से जल योजना को जल्द सक्रिय करें। तब तक टैंकर से शुद्ध पानी उपलब्ध कराएं।” जन चौपाल में ग्रामीणों की समस्याएं सुनीं और मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अश्वनी कुमार को विशेष चिकित्सा शिविर लगाने के आदेश दिए।
जिलाधिकारी ने पटेल नगर के हैंडपंप और नल के पानी की जांच की, और पुष्टि की कि नल का पानी पीने योग्य है। उन्होंने ग्राम समूह पेयजल परियोजना पड़रछ का भी निरीक्षण किया, जो 120 गांवों को स्वच्छ पानी उपलब्ध कराएगी। अपर जिलाधिकारी रोहित यादव, उप जिलाधिकारी विवेक सिंह समेत अन्य अधिकारी मौजूद थे। हालांकि निर्देशों के बाद कई गांवों में टैंकर से पानी सप्लाई की जाने लगी लेकिन यह एक अस्थाई समाधान है, जिसमें भी निरंतरता की कमी देखी गई है।

समाधान की मांग: सरकार से अपील
फ्लोराइड संकट अब राष्ट्रीय स्तर की समस्या बन चुका है। सरकार को चाहिए कि शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने के साथ-साथ स्वास्थ्य शिविर, जागरूकता अभियान और दीर्घकालिक समाधान जैसे फिल्टरेशन प्लांट लगाए। अगर त्वरित कदम नहीं उठाए गए, तो हजारों जिंदगियां और बर्बाद हो सकती हैं। सोनभद्र के ये गांव अब इंतजार नहीं कर सकते—उन्हें जीवन का अधिकार चाहिए, जहर नहीं।

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