आखिर क्यों यूसीसी से जनसंख्या नियंत्रण को अलग रखा गया, मनु गौड़ ने किया स्पष्ट

नई दिल्ली, 28 जनवरी (आईएएनएस)। उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) को लागू कर दिया गया है, जिसके बाद इस पर चर्चा तेज हो गई है। इसी बीच, यूसीसी के ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए जो समिति बनाई गई थी, उसके सदस्य मनु गौड़ ने आईएएनएस से बातचीत की। इस बातचीत के दौरान गौड़ ने बताया कि समिति को जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने के लिए कई सुझाव मिले थे, लेकिन उसको इससे अलग क्यों रखा गया।

मनु गौड़ ने आईएएनएस को बताया कि समिति को जनसंख्या नियंत्रण पर कानून बनाने के लिए कई सुझाव मिले। हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि समिति का मुख्य उद्देश्य व्यक्तिगत कानूनों से संबंधित मुद्दों पर कानून बनाना था, न कि जनसंख्या नियंत्रण पर। समिति के गठन के समय जो विषय दिए गए थे, वह संविधान के एंट्री 5 से संबंधित थे, जबकि जनसंख्या नियंत्रण एंट्री 20 से संबंधित है। इस कारण से जनसंख्या नियंत्रण पर कोई नया कानून बनाने का प्रस्ताव समिति द्वारा नहीं दिया गया। हालांकि, समिति ने जनसंख्या नियंत्रण को लेकर मिली जनभावनाओं को सरकार के सामने रखा है और उम्मीद जताई है कि भविष्य में इस पर विचार किया जाएगा।

उन्होंने इस्लामी प्रथाओं जैसे तीन तलाक, हलाला और इद्दत के मुद्दों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि इन प्रथाओं का उद्देश्य महिलाओं का शोषण करना था और इस प्रकार की कुरीतियों को समाप्त करने के लिए यूसीसी का प्रस्ताव किया गया है। विशेष रूप से, उन्होंने इद्दत को लेकर कहा कि इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि महिला गर्भवती है या नहीं, लेकिन आज के समय में तकनीकी प्रगति के कारण इसका कोई औचित्य नहीं रह गया है। यूसीसी के लागू होने से महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा होगी और यह समय की आवश्यकता थी कि इस प्रकार का कानून लागू किया जाए। उनके अनुसार, यूसीसी समाज में समानता और न्याय को बढ़ावा देने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।

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यूसीसी से आदिवासियों को बाहर रखने की वजह पर बात करते हुए मनु गौड़ ने कहा कि भारतीय संविधान में आदिवासियों को विशेष अधिकार प्राप्त हैं और उनकी सांस्कृतिक और पारंपरिक धरोहर की रक्षा के लिए उन्हें इस कानून से बाहर रखा गया है। इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 342 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि आदिवासियों को विशेष अधिकार देने का प्रावधान संविधान में किया गया है, और राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने के कारण इसे लागू करना संभव नहीं था।

इस प्रकार, यूसीसी लागू होने के बाद अब राज्य सरकार के पास यह कानून अपने नागरिकों के लिए लागू करने का अधिकार है। मनु गौड़ ने इस कदम को सराहनीय बताते हुए कहा कि यह उत्तराखंड राज्य के लिए एक ऐतिहासिक क्षण है, क्योंकि राज्य ने एक कदम आगे बढ़कर इस कानून को लागू किया है।

मनु गौड़ ने यूसीसी के तहत लिव इन रिलेशनशिप के पंजीकरण की व्यवस्था को पुलिस से दूर रखने की बात पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि लिव इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन की व्यवस्था को को पुलिस से दूर रखा गया है ताकि लोगों को इस संबंध में डर न हो। उन्होंने कहा कि पंजीकरण की प्रक्रिया में केवल एक एसडीएम (सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट) स्तर के अधिकारी को शामिल किया जाएगा और इसका पूरा डेटा एक मजिस्ट्रेट स्तर के अधिकारी के पास रहेगा। इस प्रक्रिया से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी झूठी शिकायत दर्ज नहीं हो सके। यदि कोई व्यक्ति बार-बार झूठी शिकायत करता है, तो उसे सजा दी जाएगी, और उसकी पहचान पर आधारित पंजीकरण को निष्क्रिय कर दिया जाएगा। समिति ने लिव इन रिलेशनशिप को लेकर यह कदम उठाया है ताकि महिलाओं और बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा हो सके। उनका कहना था कि इस प्रक्रिया के जरिए समाज में लिव इन रिलेशनशिप के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर किया जाएगा और यह महिलाओं और बच्चों के संरक्षण के लिए एक सकारात्मक कदम है।

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मनु गौड़ ने अंत में बताया कि यूसीसी के ड्राफ्ट को तैयार करने के लिए जब समिति का गठन किया गया तो इसके खिलाफ भी न्यायालय में भी कुछ पीआईएल (लोकहित याचिका) दायर की गई थी, जिनमें समिति के गठन को गलत बताकर इसको चुनौती दी गई थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया था।

–आईएएनएस

पीएसके/जीकेटी

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