पाकिस्तान से दूर हुआ अफगान व्यापार, ट्रांजिट ट्रेड में भारी गिरावट दर्ज

काबुल 
दिन हो या रात, पाकिस्तान एक ही सपना देखता है कि कैसे भारत को बर्बाद किया जाए। उसका यह सपना आज तक सपना ही है, लेकिन भारत के दोस्त ने पाकिस्तान को बर्बाद करना शुरू कर दिया है। दरअसल, पाकिस्तान के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका देते हुए अफगानिस्तान ने अपने ट्रांजिट व्यापार को पाकिस्तानी मार्गों से तेजी से दूर कर दिया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान-पाकिस्तान ट्रांजिट ट्रेड पिछले वित्तीय वर्ष में तेज गिरावट के साथ मात्र 367 मिलियन अमेरिकी डॉलर रह गया, जबकि वर्ष 2021 में यह आंकड़ा 5 बिलियन डॉलर तक पहुंचा हुआ था।

रिपोर्ट में क्या है?
डॉन अखबार ने रविवार को प्रकाशित अपनी विस्तृत रिपोर्ट में बताया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 (FY-26) में दोनों देशों के बीच ट्रांजिट व्यापार मात्र 11,592 कंटेनर तक सिमट गया। यह हाल के वर्षों में दर्ज की गई सबसे बड़ी गिरावटों में से एक है। रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि यह गिरावट अक्टूबर 2025 में पाकिस्तान द्वारा सुरक्षा कारणों से अफगानिस्तान के साथ सीमा बंद किए जाने से पहले ही शुरू हो चुकी थी।

दरअसल, तालिबान के सत्ता में लौटने से ठीक पहले का समय दोनों देशों के ट्रांजिट व्यापार के लिए स्वर्णिम रहा। वित्तीय वर्ष 2017 (FY-17) में ट्रांजिट ट्रैफिक लगभग 60500 कंटेनर था, जो FY-21 में बढ़कर करीब 89000 कंटेनर हो गया। इस दौरान व्यापार मूल्य लगभग 5 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया। बता दें कि यह बढ़ोतरी पाकिस्तान और अशरफ गनी सरकार के बीच तनावपूर्ण राजनीतिक संबंधों के बावजूद हुई थी।

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काबुल ने उस समय पाकिस्तानी बंदरगाहों (कराची और ग्वादर) को अपने अंतरराष्ट्रीय व्यापार का मुख्य रास्ता बनाए रखा। अफगान आयातकों को इन बंदरगाहों का उपयोग करने से नहीं रोका गया, ताकि कम परिवहन लागत पर सामान लाया जा सके और मुद्रास्फीति के दबाव को नियंत्रित किया जा सके। तालिबान के सत्ता संभालने के बाद भी शुरुआती दौर में ट्रेड में सुधार देखा गया। FY-23 में कंटेनर ट्रैफिक बढ़कर 1,02,886 तक पहुंच गया और कार्गो का कुल मूल्य 6.7 बिलियन डॉलर हो गया। लेकिन इसके बाद अचानक गिरावट शुरू हुई। FY-24 में वॉल्यूम घटकर 54,114 कंटेनर रह गया और FY-25 में यह और गिरकर 42,959 कंटेनर (कुल मूल्य 1.36 बिलियन डॉलर) हो गया।

गिरावट के कारण क्या है?
ट्रेड एनालिस्टों के अनुसार, अक्टूबर 2025 की सीमा बंदी ने गिरावट को तेज जरूर किया, लेकिन यह गिरावट काबुल की पहले से चल रही रणनीति का नतीजा है। अफगानिस्तान ने ईरानी मार्गों (चाबहार बंदरगाह समेत) की ओर तेजी से रुख किया और पाकिस्तानी बंदरगाहों पर अपनी निर्भरता कम कर दी। इस बदलाव का सबसे बड़ा कारण अफगानिस्तान की पाकिस्तानी पोर्ट्स पर निर्भरता घटाने की दीर्घकालिक रणनीति मानी जा रही है। सुरक्षा चिंताओं, बार-बार सीमा विवाद और पाकिस्तान पर टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) को समर्थन देने के आरोपों ने भी इस प्रक्रिया को तेज किया।

दोनों देशों पर क्या प्रभाव?
इस गिरावट से पाकिस्तान को सीधा आर्थिक नुकसान हुआ है। ट्रांजिट ट्रेड से मिलने वाला राजस्व, बंदरगाह शुल्क, परिवहन व्यवसाय और संबंधित नौकरियां प्रभावित हुई हैं। दूसरी ओर अफगानिस्तान को भी इस बदलाव की कीमत चुकानी पड़ रही है। ईरानी मार्ग लंबे और महंगे होने के कारण परिवहन तथा लॉजिस्टिक्स खर्च बढ़ गया है, जिसका बोझ सीधे अफगान उपभोक्ताओं पर पड़ रहा है। इससे महंगाई का दबाव बढ़ा है, खासकर पूर्वी और दक्षिणी अफगानिस्तान में। पख्तून बहुल इलाके, जो लंबे समय से पाकिस्तानी सामान और सीमा पार व्यापार पर निर्भर रहे हैं, सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं।

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रिपोर्ट के अनुसार, व्यावसायिक गतिविधियां कम होने से सीमा के दोनों ओर नौकरियां घटी हैं और परिवारों की आय प्रभावित हुई है। पाकिस्तान के बॉर्डर से लगे प्रांतों में मिलिटेंट हिंसा और अशांति भी जारी है, जिससे स्थिति और खराब हुई है। पाकिस्तान ने नवंबर 2022 में सीजफायर खत्म होने के बाद टीटीपी पर अफगान धरती से हमले कराने का आरोप लगाया है।

अब आगे क्या होगा?
रिपोर्ट में कहा गया है कि अफगानिस्तान-पाकिस्तान ट्रांजिट ट्रेड अपने पीक स्तर से तेजी से दूर जा चुका है। यह गिरावट 2025 की सीमा बंदी से पहले शुरू हुई थी और काबुल के वैकल्पिक मार्गों की ओर तेज शिफ्ट के कारण आगे भी जारी रहने की संभावना है। जानकारों का मानना है कि अगर दोनों देशों के बीच विश्वास का माहौल नहीं बना और सुरक्षा व आर्थिक सहयोग पर ठोस बातचीत नहीं हुई, तो इस ट्रेड को फिर से पहले के स्तर पर लाना मुश्किल होगा। फिलहाल, पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ा रणनीतिक और आर्थिक नुकसान साबित हो रहा है, जबकि अफगानिस्तान नई आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने में लगा हुआ है।

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