दीपावली पर खास महत्व रखने वाले ओल की खेती से किसानों की चमकी किस्मत, 3500 रुपये क्विंटल तक भाव

 समस्तीपुर 
 दीपावली में प्रमुखता से भोग के रूप में खाए जाने वाले ओल की खेती समस्तीपुर में व्यावसायिक रूप ले चुकी है। यहां उत्पादित ओल का एक बड़ा हिस्सा उत्तर प्रदेश, बंगाल, झारखंड और आंध्र प्रदेश भेजा जाता है। कई परिवार इसे मां लक्ष्मी का प्रिय भोग मानकर पूजा के बाद खाते हैं।

यह मान्यता है कि कठिन परिस्थितियों में रहकर भी यह कंद जीवन पाता है, ठीक उसी तरह इंसान को भी मुश्किलों में धैर्य रखकर आगे बढ़ना चाहिए। वैसे, इसके पीछे वैज्ञानिक कारण भी है।

समस्तीपुर जिले में ओल की खेती का दायरा दो हजार हेक्टेयर से अधिक में फैल चुका है और यहां आठ लाख क्विंटल से अधिक ओल का उत्पादन होता है।

एक दशक पहले जिले में 100 से 150 हेक्टेयर में ओल की खेती होती थी, आज दो हजार हेक्टेयर से ज्यादा रकबे में इसकी खेती हो रही है। आठ लाख क्विंटल से ज्यादा का उत्पादन हो रहा है।

यहां के ओल की मांग इतनी है कि व्यापारी खेत से निकालने से पहले ही खरीदारी के लिए पहुंचने लगते हैं। किसानों को ओल का भाव भी बेहतर मिल रहा है।

जिले में तीन हजार से लेकर 3500 रुपये प्रति क्विंटल की दर से किसान ओल बेच रहे हैं, जबकि दो साल पहले 16 सौ से 18 सौ रुपये प्रति क्विंटल इसका भाव था। खेती को प्रोत्साहन देने की घोषणा के बाद अगले पांच वर्ष में रकबे में दोगुना वृद्धि की उम्मीद है।

50 प्रतिशत ओल जाता उत्तर प्रदेश
समस्तीपुर में उत्पादित ओल का पचास प्रतिशत सब्जी के रूप में उत्तर प्रदेश भेजा जाता है। बीज के लिए चालीस प्रतिशत बंगाल और दस प्रतिशत झारखंड तथा आंध्र प्रदेश को आपूर्ति की जाती है।

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दीपावली के समय इसकी मांग और बढ़ जाती है। समस्तीपुर के सातनपुर में ओल का सबसे बड़ा आढ़त है। जिले के पचास प्रतिशत से अधिक ओल यहीं पर बेचे जाते हैं।

व्यापारी दिनेश कुमार कहते हैं कि अगले तीन-चार सालों में ओल का उत्पादन दो से तीन गुणा बढ़ जाएगा। किसान को उसके उत्पाद का उचित मूल्य के साथ हाथ में नकद मिल जाता है। इस वजह से किसान इसकी खेती कर खुश हैं।

ओल के फायदे
डा. एके आदित्य बताते हैं कि ओल में भरपूर मात्रा में फाइबर (तंतु) होता है, जो पाचन क्रिया को सुधारता है। फाइबर के कारण इसे खाने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है। बार-बार भूख नहीं लगती। वजन नियंत्रित रखने में भी मददगार है। इसमें ग्लूकोज और शर्करा की मात्रा बहुत कम होती है। कैलोरी भी कम होती है। शुगर के मरीजों के लिए यह अच्छा विकल्प है।

समाजशास्त्री सचिदानंद कहते हैं कि ओल (जिमीकंद) को जमीन से खोदकर निकालने के बाद भी इसका एक छोटा हिस्सा या जड़ मिट्टी में रह जाता है, जिससे अनुकूल परिस्थिति में वह दोबारा उग जाता है। माना जाता है कि जिस तरह यह कंद कभी खत्म नहीं होता, उसी तरह घर में भी धन-धान्य, अन्न और सुख-समृद्धि का भंडार बना रहे।

यूरोलाजिस्ट डा. डीपी तिवारी इसे मौसम के अनुकूल तासीर वाला फल बताते हैं। कहते हैं कि ओल की तासीर गर्म होती है। दीपावली के बाद ठंड की शुरुआत होती है, ऐसे में इसे खाने से शरीर को गर्माहट मिलती है, जो सर्दियों के मौसम के लिए बहुत फायदेमंद है।

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