नीम करोली बाबा के 5 चमत्कार, भक्त आज भी मानते हैं दिव्य शक्तियों का प्रमाण

उत्तराखंड की पावन वादियों में स्थित कैंची धाम के गुरु, परम सिद्ध संत नीम करोली बाबा का जीवन अलौकिक सिद्धियों और असीम करुणा का सजीव उदाहरण है. करोड़ों श्रद्धालु उन्हें कलयुग में भगवान हनुमान जी का साक्षात अवतार मानते हैं. बाबा जी का जीवन किसी आडंबर से दूर, अत्यंत सरल और सहज था कि वे बस एक कंबल ओढ़कर बैठते थे, लेकिन उनके दर पर आने वाला कोई भी भक्त कभी खाली हाथ वापस नहीं गया.
उनके जीवनकाल में ऐसे अनगिनत प्रसंग घटे, जहां प्रकृति के नियम भी उनके तपोबल के आगे नतमस्तक हो गए. आइए जानते हैं नीम करोली बाबा के जीवन से जुड़े 5 ऐसे अलौकिक चमत्कार, जो आज भी श्रद्धालुओं के मन में उनके प्रति अगाध श्रद्धा और विश्वास जगाते हैं.
नदी के पानी का शुद्ध देसी घी में बदलना
कैंची धाम आश्रम के निर्माण के शुरुआती दिनों में एक विशाल भंडारे का आयोजन किया गया था. श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण अचानक पूरियाँ तलने के लिए देसी घी खत्म हो गया. सेवक घबरा गए और उन्होंने तुरंत बाबा जी को जाकर यह बात बताई. बाबा जी ने शांत भाव से कहा, "घबराओ मत, पास बहती नदी से दो बाल्टी पानी भरकर ले आओ."
सेवक दौड़े-दौड़े गए और नदी से पानी भरकर ले आए. जब बाबा जी के आदेश पर उस पानी को पूरियां तलने वाली गर्म कड़ाही में डाला गया, तो कड़ाही में गिरते ही वह पानी दिव्य सुगंध वाले शुद्ध देसी घी में परिवर्तित हो गया. उस घी से पूरे भंडारे की पूरियाँ तली गईं और अगले दिन बाबा जी के कहने पर बाजार से उतना ही देसी घी खरीदकर वापस नदी में प्रवाहित कर दिया गया.
खारे पानी को गंगाजल की तरह मीठा बनाना
एक बार बाबा जी के आश्रम के समीप स्थित पानी का एकमात्र प्राकृतिक स्रोत पूरी तरह खारा हो गया. उसका पानी इतना कसैला था कि पीने या भोजन बनाने योग्य नहीं बचा था. स्थानीय लोग और आश्रम के भक्त इस समस्या से काफी चिंतित थे.
जब यह बात बाबा जी के संज्ञान में आई, तो वे स्वयं उस जल स्रोत के पास गए. उन्होंने अत्यंत भाव से उसमें थोड़ा सा चरणामृत मिलाया और भगवान का ध्यान करते हुए मंत्रोच्चार किया. इसके बाद जैसे ही लोगों ने उस पानी को पिया, तो वे आश्चर्यचकित रह गए—वह खारा पानी न केवल पूरी तरह मीठा और सुपाच्य हो चुका था, बल्कि उसमें गंगाजल जैसी दिव्यता और ताजगी आ गई थी.
भक्त की जानलेवा बीमारी को अपने शरीर पर लेना
नीम करोली बाबा अपने भक्तों से मां की तरह प्रेम करते थे. जब भी उनका कोई प्रिय भक्त किसी असाध्य, जानलेवा बीमारी या असहनीय पीड़ा से ग्रस्त होता था, तो बाबा जी की करुणा उमड़ पड़ती थी. वे अपने तपोबल से भक्त के प्रारब्ध और बीमारी के कष्ट को स्वयं अपने शरीर पर धारण कर लेते थे.
ऐसे कई अवसर आए जब भक्त तो रातों-रात पूरी तरह स्वस्थ होकर उठ खड़ा होता था, लेकिन दूसरी ओर बाबा जी स्वयं अपने कंबल के भीतर दर्द से कराहते नजर आते थे. वे भक्त के कष्टों को मुस्कुराते हुए अपने शरीर पर झेल लेते थे ताकि उनके बच्चों को कोई आंच न आए.
कड़ाके की बर्फीली ठंड में नदी में समाधि
उत्तराखंड की हाड़-कांपने वाली सर्दियों में, जहां आम इंसान कई परतों वाले गर्म कपड़ों में भी ठिठुरने लगता है, बाबा जी केवल एक सूती धोती और कंबल में रहते थे. कई बार भीषण बर्फ़ीली रात में बाबा जी ठंडे बर्फीले पानी की नदी में उतर जाते थे और घंटों जल-समाधि में लीन रहते थे.
जब वे जल-समाधि पूरी करके बाहर निकलते, तो उनके शरीर पर ठंड का नामोनिशान तक नहीं होता था. उनका शरीर ऐसे दमकता था मानो वे किसी सामान्य तापमान में बैठकर आए हों. उनकी यह योग-साधना उनके उच्चकोटि के सिद्ध योगी होने का प्रत्यक्ष प्रमाण थी.
भक्त को नया जीवनदान देना
बाबा जी के दरबार में भक्ति की कोई सीमा नहीं थी और न ही उनके आशीर्वाद की. उनके कई भक्तों के जीवन में ऐसे क्षण आए जब गंभीर बीमारियों या दुर्घटनाओं के कारण डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए थे और डॉक्टरों के अनुसार मृत्यु निश्चित थी.
ऐसे समय में भक्तों के परिजनों ने केवल बाबा जी का ध्यान किया या उनका छुआ हुआ 'आरोग्य प्रसाद' (या चरणामृत) मरीज को दिया. बाबा जी के एक अभयदान और संकल्प से काल को भी पीछे हटना पड़ा. यमराज के द्वार तक पहुंच चुके मरीज चमत्कारिक रूप से पूरी तरह ठीक हो गए और डॉक्टरों के लिए यह बात हमेशा एक अनसुलझा रहस्य बनी रही.










