बैरगनिया में झोला छाप डाक्टरों की भरमार

मीडिया हाउस न्यूज एजेंसी 13ता.बैरगनिय सीतामढ़ी।जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में झोलाछाप डॉक्टरों की कमी नहीं है। जो विभिन्न पैथियों से लोगों का इलाज के नाम से उनके जीवन के साथ खेल रहे हैं। कभी-कभार इनके खिलाफ अभियान चलाया जाता है तो ये कुछ समय तक अपनी दुकान बंद कर देते हैं। तथा थोड़े समय बाद पुन: अपनी प्रेक्टिस करने लगते हैं।प्रदेश में प्रशिक्षित चिकित्सकों की कमी है और जो हैं वे गांवों में जाना नहीं चाहते। इसका फायदा ये झोलाछाप डॉक्टर उठाते हैं। प्रदेश में झोलाछाप डॉक्टरों को पैदा करने वाले संस्थानों की भी कमी नहीं है। जहां से डिग्री या प्रमाणपत्र के आधार पर ये अपनी दुकानदारी चलाते हैं। हालांकि न तो ये डिग्री प्रदान करने वाले संस्थान की कोई अहमियत है और न इन डिग्रियों की क्योंकि ये संस्थान सक्षम अथॉरिटी से मान्यता प्राप्त नहीं होते।उल्लेखनीय है कि कई प्रचलित वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता प्रदान करने के लिए 1998 में दिल्ली उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई थी। न्यायालय के निर्देश पर स्वास्थ्य मंत्रालय ने इन चिकित्सा पद्धतियों को मान्यता प्रदान करने की संभावनाएं तलाशने के लिए चिकित्सा अनुसंधान परिषद निर्देशक की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था।
जिलें में सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी की वजह से ग्रामीण क्षेत्र में झोलाछाप का कारोबार फलफूल रहा है। झोलाछाप गंभीर बीमारियों में लोगों की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। शहर की गलियों से लेकर मुख्य मार्केटों तक झोलाछाप डॉक्टरों की भरमार हो गई है। आलम यह है कि एक-एक गली में चार-चार क्लीनिक चल रहे हैं। बिना किसी डिग्री के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े हर मर्ज का इलाज इनके यहां होता है। अगर मरीज थोड़ा ठीक भी है और इनके इलाज अगर वो बीमार पड़ जाए तो इससे इनको कोई परवाह नहीं है। इन झोलाछाप डॉक्टरों का लक्ष्य सिर्फ चंद पैसे कमाना ही होता है। यही वजह है कि आए दिन गरीब तबके के लोग इन डॉक्टरों के शिकार हो जाते हैं। जिससे वे अपनी जान तक गंवा बैठते हैं। इसके बावजूद भी ऐसे झोलाछाप डॉक्टरों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए जाते।








