डीपीएस स्कूल का गो ग्रीन इनिशिएटिव’ के तहत पर्यावरण संरक्षण पहल हो रहा कारगर 

मीडिया हाउस न्युज एजेंसी बोकारो : 21वीं सदी के इस दौर में यकीनन हमने अपने जीवन-यापन के हर क्षेत्र में विकास के नए आयाम गढ़े हैं। तकनीकी और औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप आज विकास की परिभाषा एक नए क्षितिज पर पहुंच चुकी है। लेकिन, विकास के इस भागम-भाग में एक सबसे महत्वपूर्ण चीज, जो पीछे छूटती चली जा रही है, वह है हमारा पर्यावरण। हमारी सुख-सुविधाओं के लिए सबसे अधिक नुकसान अगर किसी को हुआ है, तो वह पर्यावरण ही है। आज इसका संरक्षण पूरी दुनिया के लिए चुनौती बन चुका है। कई वैश्विक संगठनों के अलावा सरकारी और गैरसरकारी स्तरों पर भी प्रकृति और इसकी हरीतिमा बचाए रखने को लेकर सतत प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों में बच्चों की सहभागिता भी काफी महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज के बच्चे ही कल के भविष्य हैं। इसी सोच के साथ दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) बोकारो अपने यहां विगत लगभग ढ़ाई दशक से हरित भारत अभियान को सशक्त बनाने में जुटा है। चारों तरफ पेड़-पौधों से हरे-भरे डीपीएस बोकारो ने गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के साथ-साथ अपने यहां ‘गो ग्रीन इनिशिएटिव’ के तहत पर्यावरण संरक्षण को लेकर ऐसी कई अनूठी पहल की है, जो पर्यावरण बचाने के दृष्टिकोण से काफी कारगर साबित हो रही हैं। अवसर विशेष पर स्वच्छता एवं पौधारोपण अभियान के अलावा विभिन्न गतिविधियों में विद्यार्थियों की सीधी सहभागिता होती है। इन्हीं प्रयासों का परिणाम है कि विद्यालय को तीन-तीन बार राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मंचों पर ग्रीन स्कूल अवॉर्ड से सम्मानित किया जा चुका है।

महापुरुषों के नाम पर लगाते हैं पौधे, 11 वर्षों में 4000 पौधारोपण : बच्चे आगे चलकर पेड़-पौधे बचाने की मुहिम का अगुवा बनें और इसके साथ-साथ अपने देश के महापुरुषों व उनके संघर्षों से प्रेरित हो सकें, इस उद्देश्य से डीपीएस बोकारो विगत लगभग एक दशक से एक अनूठी मुहिम चला रहा है। विद्यालय परिसर में एक हरीतिमा-क्षेत्र स्थापित किया गया है। खास बात यह है कि इसमें बच्चों द्वारा महापुरुषों और अन्य वीर पुरोधाओं के नाम पर पौधे लगाए जाते हैं। बच्चों के ग्रीन ब्रिगेड (हरित सेना) द्वारा विगत लगभग 11 वर्षों में करीब चार हजार पौधे इसमें लगाए जा चुके हैं। इनमें से अधिकतर अब बड़े होकर सुंदर हरियाली और शीतलता भी बिखेर रहे हैं।

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इको क्लब- जीरो वेस्ट स्कूल बनाने की मुहिम
विद्यालय में इको क्लब का गठन कर पूरे स्कूल परिसर को शत-प्रतिशत कचरा-मुक्त बनाने की खास मुहिम शुरू की गई है। इको वॉलेंटियर के रूप में विद्यार्थियों के साथ-साथ उनके शिक्षक भी इस मिशन में शामिल किए गए हैं, जो विद्यालय की विशेष स्वच्छता एवं हरियाली की दिशा में कार्यरत हैं।

पेपर रीसाइक्लिंग यूनिट – रद्दी कागज को रीसाइकिल कर पूरी करते हैं जरूरत,विद्यालय में लगभग डेढ़ दशक पूर्व शुरू की गई पेपर रीसाइक्लिंग यूनिट की पहल आज भी उपयोगी साबित हो रही है। यह एक तरफ जहां कागज को बर्बाद होने से बचा रही है, वहीं दूसरी ओर इससे स्कूल को हर महीने लगभग 50 हजार रुपए की आर्थिक बचत भी हो रही है। इस यूनिट में रद्दी कागज से हैंडमेड पेपर तैयार करने के सभी उपकरण और संसाधन उपलब्ध हैं, जिससे रोजाना लगभग 20 किलोग्राम कागज तैयार किया जाता है। इस कागज का इस्तेमाल स्कूल की पेपर फाइल तैयार करने के अलावा आर्ट एंड क्राफ्ट में बच्चों के लिए चार्ट पेपर, कार्टेज पेपर बनाने सहित अन्य तरह के काम में किया जाता है। डीपीएस बोकारो इस तरह की पेपर रीसाइक्लिंग यूनिट लगाने वाला इस जिले का एकमात्र विद्यालय है।

वर्षों से सौर ऊर्जा का इस्तेमाल, सालाना चार लाख तक की बचत : गो ग्रीन इनिशिएटिव’ के तहत केंद्रीय तथा राज्य सरकार की ऊर्जा संरक्षण नीति को अपनाते हुए डीपीएस बोकारो अपने आवश्यकतानुसार बिजली का उत्पादन खुद कर हर वर्ष लगभग चार लाख रुपए की बचत कर रहा है। इससे स्कूल-अध्ययन के दौरान न सिर्फ स्कूली ऊर्जा की पूर्ति होती है, बल्कि जेनरेटर से होनेवाले प्रदूषण से भी निजात मिल सकी है। 25 केवीए बिजली उत्पादन क्षमता वाले यहां के सोलर प्लांट से मिलनेवाली बिजली स्कूल के ए ब्लॉक की हर आवश्यक जरूरतें पूरी कर रही है।

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चरक वाटिका- औषधीय पौधों का छोटा संसार
कुषाण राज्य के राजवैद्य आयुर्वेद विशारद महर्षि चरक के नाम से स्थापित चरक वाटिका डीपीएस बोकारो के अद्वितीय प्रयासों में से एक महत्वपूर्ण पहल है। विद्यालय की कैंटीन व बस पड़ाव के बीच स्थित यह वाटिका औषधीय पौधों का अपने-आप में एक छोटा संसार है। यहां 100 से अधिक कई छोटे-बड़े पौधे हैं, जिनका औषधीय उपयोग किया जाता है। तुलसी, नीम, आंवला, लेमन ग्रास, ब्राह्मी, हल्दी, चिरायता, अडूसा, सदाबहार, सहजन, हडजोरा, करीपत्ता, अड़हुल, घृतकुमारी, बहेड़ा, हरड़, दालचीनी, अशोक सहित कई औषधीय पौधे लगाए गए हैं। समय-समय पर विद्यालय के छात्र-छात्राओं को इस वाटिका में बुलाकर इन पौधों की महत्ता से संबंधित व्यावहारिक जानकारी दी जाती है। चरक वाटिका के पौधों का इस्तेमाल औषधि बनाने में किया जाता है।

वर्मी कल्चर- केंचुआ खाद से कृषि-कार्य
‘गो ग्रीन इनिशिएटिव’ के अंतर्गत ही विद्यालय परिसर में रसायन-रहित कृषि को बढ़ावा देकर बच्चों को इस दिशा में प्रेरित करने के उद्देश्य से वर्मी कल्चर से खेती की जाती है। केंचुआ खाद या वर्मी कम्पोस्ट पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाया जाता है। वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। इस विधि से यहां कद्दू, खीरा, टमाटर, बैंगन जैसी तरह-तरह की सब्जियों की खेती की जाती है।

जैव हरित वाटिका- जैविक कृषि-वानिकी की पहल*
डीपीएस बोकारो अपने यहां आर्गेनिक फार्मिंग (जैविक खेती) को वर्षों को प्रोत्साहित कर रहा है। इसका मकसद पर्यावरण को हानि पहुंचाने वाले रासायनिक खादों की बजाय जैविक खादों की मदद से कृषि व वानिकी को बढ़ावा देना है। इसे अब जैव हरित वाटिका का नाम दिया गया है। हरित भारत की ओर सभी को प्रेरित व शिक्षित करने की अपनी अनूठी पहल की कड़ी में डीपीएस बोकारो विद्यार्थियों के लिए ‘फुलवारी- पोषण प्रकृति का’ नामक प्रतियोगिता भी कराती है। इसके तहत बच्चे व उनके अभिभावक जिस पौधे को गोद लेते हैं, उसकी बेहतर तरीके से देखभाल करते हैं। उन पौधों की प्रदर्शनी लगाई जाती है और उनमें उत्कृष्टता के आधार पर कुछ को पुरस्कृत भी किया जाता है। पर्यावरण संरक्षण की दिशा में रेन वाटर हार्वेस्टिंग भी डीपीएस बोकारो की एक महत्वपूर्ण पहल है। यहां ऐसी व्यवस्था की गई है कि वर्षा से संग्रहित जल बर्बाद होने की बजाय भू-गर्भ जलस्तर को बढ़ाने में मददगार साबित होती है। विद्यालय भवन के पिछले हिस्से में एक बड़े आकार का जल-सोख्ता बनाया गया है, जिसमें छत पर गिरने वाला वर्षा का पानी गिरता है और भूमिगत हो जाता है। इस टैंक के भर जाने पर उसमें पंप लगाकर उस पानी का इस्तेमाल बागवानी में किया जाता है।

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अतिथियों का ग्रीन वेलकम- एक अनूठा सत्कार :
किसी अतिथि के आने पर कुछ लोग जहां पुष्पगुच्छ या अन्य चीजों से उनका स्वागत करते हैं, वहीं दूसरी ओर डीपीएस बोकारो की सोच कुछ अलग है। हरीतिमा के प्रति जागरूकता के संदेश के साथ यहां हरेक आयोजन पर आनेवाले अतिथियों का स्वागत उन्हें पौधे भेंटकर किया जाता है। सुंदर गमले में साज-सज्जा के साथ भेंट किए जानेवाले पौधे का आकर्षण अपने-आप में खास होता है। यहां से जाने वाले अतिथि अपने साथ यह हरित-स्मृति ले जाते हैं और पौधा से पेड़ होने तक यह उपहार उन्हें विद्यालय-आगमन का स्मरण कराता रहता है।

अभ्यागतों को देते हैं बीजयुक्त कार्ड : विद्यालय में खास अवसरों पर आमंत्रित अभ्यागतों को विभिन्न प्रकार के फल-सब्जियों के बीज लगे कार्ड प्रवेश-पत्र के रूप में दिए जाते हैं। ये कार्ड ऐसे होते हैं कि उनमें से बीज निकालकर उसे रोप देने पर पौधे निकल सकते हैं। उद्देश्य यही है कि अतिथि यहां से जाने के बाद एक पौधा अवश्य लगाएं। अगर कहीं वह कार्ड गिर भी जाए, तो उसमें लगे बीज से खुद-ब-खुद उस स्थान पर पौधा उग जाए। डीपीएस बोकारो के प्राचार्य डॉ. ए. एस. गंगवार का कहना है कि विद्यालय की ओर से बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के साथ-साथ पर्यावरण-संरक्षण और समाजहित में भी लगातार कार्य किए जा रहे हैं। हमें मानव जाति और प्रकृति मां के बीच के सुंदर संबंध को खराब नहीं करना चाहिए। पर्यावरण बचाने की दिशा में बचपन से ही जागरुकता और बोध आवश्यक है। एक बच्चा जब जागरूक होगा, तो उसका पूरा परिवार, समाज और अंततः पूरा राष्ट्र एवं विश्व समुदाय पेड़-पौधों की हिफाजत के प्रति जिम्मेदार बन सकेगा।

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