रौनियार समाज के लिए गौरव का विषय, हवलदारी राम गुप्त ‘मनोहर पोथी’ के रचयिता, शिक्षक, साहित्यकार और इतिहासकार
“जिस समाज ने देश को साहित्य और ज्ञान की ऐसी धरोहर दी, नई पीढ़ी को अपने ऐसे महान व्यक्तित्वों को जानना चाहिए।

मीडिया हाउस न्यूज एजेंसी रांची-हिन्दी पढ़ने वाली पुरानी पीढ़ी में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा, जिसने ‘मनोहर पोथी’ का नाम न सुना हो। एक समय यह पोथी बच्चों को हिन्दी पढ़ना-लिखना सिखाने वाली अत्यंत लोकप्रिय पुस्तकों में गिनी जाती थी। हिन्दी भाषी क्षेत्रों के साथ-साथ गैर-हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भी अनेक बच्चों ने इससे हिन्दी का प्रारंभिक ज्ञान प्राप्त किया। लेकिन दुर्भाग्य की बात है कि जिस कृति ने लाखों लोगों को हिन्दी सीखने में सहायता की, उसके रचयिता हवलदारी राम गुप्त का नाम आज बहुत कम लोग जानते हैं।
रौनियार समाज के लिए यह जानना विशेष गौरव का विषय है कि उपलब्ध विवरणों के अनुसार हवलदारी राम गुप्त का संबंध हमारे समाज से था। यदि हम अपने समाज के इतिहास, साहित्य और संस्कृति को आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना चाहते हैं, तो ऐसे व्यक्तित्वों को सामने लाना हमारी जिम्मेदारी है।
हरिहरगंज की धरती पर जन्म
उपलब्ध ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार हवलदारी राम गुप्त का जन्म 5 जनवरी 1888 को पलामू जिले के हरिहरगंज में हुआ था। उस समय शिक्षा का प्रसार आज की तरह व्यापक नहीं था। ऐसे समय में उन्होंने शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। वर्ष 1911 में उन्होंने कोल्हान जिला स्कूल में सहायक शिक्षक के रूप में अपने शिक्षण जीवन की शुरुआत की। शिक्षक के रूप में कार्य करते हुए उन्होंने शिक्षा को केवल नौकरी नहीं, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम बनाया।
शिक्षक से साहित्यकार तक
हवलदारी राम गुप्त हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं में लेखन करते थे। उनका साहित्यिक संसार काफी व्यापक था। उन्होंने बच्चों की शिक्षा से लेकर इतिहास, कथा-साहित्य और नाटक तक विभिन्न विधाओं में लेखन किया। उनकी सर्वाधिक चर्चित रचनाओं में ‘मनोहर पोथी’ का विशेष स्थान है। इस पुस्तक ने लंबे समय तक बच्चों को हिन्दी भाषा का प्रारंभिक ज्ञान देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यही कारण है कि हवलदारी राम गुप्त को केवल एक लेखक नहीं, बल्कि हिन्दी शिक्षा के प्रसार से जुड़े महत्वपूर्ण साहित्यकार के रूप में भी याद किया जाना चाहिए।
लगभग 30 पुस्तकों की रचना
उपलब्ध विवरण के अनुसार हवलदारी राम गुप्त ने अपने जीवनकाल में लगभग 30 पुस्तकों का लेखन एवं प्रकाशन किया। उनकी प्रमुख रचनाओं में—
– मनोहर पोथी
– कंगाल की बेटी
– आदर्श विमाता
– वीर लक्ष्मण
– त्यागी भरत
– जलजला
– एटु सिंह
– कोहड़ा पांडेय
– छोटानागपुर का इतिहास
– पलामू का इतिहास
आदि का उल्लेख मिलता है।इन रचनाओं से स्पष्ट होता है कि उनका साहित्यिक क्षेत्र काफी विस्तृत था। वे केवल बाल-साहित्यकार नहीं थे, बल्कि इतिहास और समाज से जुड़े विषयों पर भी गंभीर लेखन करते थे।
‘पलामू का इतिहास’ और ऐतिहासिक योगदान
हवलदारी राम गुप्त की ऐतिहासिक रुचि उनकी रचना ‘पलामू का इतिहास’ में विशेष रूप से दिखाई देती है। उपलब्ध विवरण के अनुसार इस ग्रंथ को 1970 में भारत सरकार द्वारा शोधग्रंथ के रूप में पुरस्कृत किया गया था। यह उपलब्धि बताती है कि उन्होंने अपने क्षेत्र के इतिहास को संकलित करने और उसे लिखित रूप देने का महत्वपूर्ण कार्य किया। स्थानीय इतिहास को संरक्षित करना किसी भी समाज के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि आने वाली पीढ़ियां इन्हीं दस्तावेजों के माध्यम से अपने अतीत को जान पाती हैं।
बांग्ला साहित्य में भी योगदान
हवलदारी राम गुप्त की प्रतिभा केवल हिन्दी तक सीमित नहीं थी। उन्होंने बांग्ला में भी लेखन किया। उनके द्वारा रचित ‘श्यामली’ नामक बांग्ला नाटक का कोलकाता के दर्पणा थिएटर में छह महीने तक मंचन होने का उल्लेख मिलता है। यह तथ्य उनके बहुभाषी साहित्यिक व्यक्तित्व को दर्शाता है। उस दौर में पलामू जैसे क्षेत्र से निकलकर हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं में साहित्य रचना करना अपने आप में उल्लेखनीय उपलब्धि थी।
‘हलधर प्रेस’ और ‘हलधर समाचार’
वर्ष 1945 में पलामू जिला स्कूल के प्रधानाचार्य पद से सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका साहित्यिक जीवन समाप्त नहीं हुआ। वर्ष 1948 में उन्होंने ‘हलधर प्रेस’ की स्थापना की। इसी प्रेस से उन्होंने ‘हलधर समाचार’ नामक साप्ताहिक पत्र का प्रकाशन प्रारंभ किया। उपलब्ध जानकारी के अनुसार इसका प्रकाशन 15 जनवरी 1978 तक जारी रहा। इससे पता चलता है कि वे केवल लेखक ही नहीं थे, बल्कि पत्रकारिता और प्रकाशन के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उन्होंने अपनी लेखनी और प्रकाशन के माध्यम से समाज में विचार और जानकारी पहुंचाने का प्रयास किया।
रौनियार समाज के लिए प्रेरणा
आज जब हम अपने समाज के इतिहास की बात करते हैं, तो हमारा ध्यान प्रायः सामाजिक, व्यापारिक और राजनीतिक क्षेत्र में योगदान देने वाले लोगों तक सीमित रह जाता है। लेकिन किसी समाज की वास्तविक शक्ति उसकी शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और बौद्धिक परंपरा में भी होती है। हवलदारी राम गुप्त जैसे व्यक्तित्व हमें बताते हैं कि हमारे समाज की जड़ें केवल आर्थिक गतिविधियों तक सीमित नहीं हैं। हमारे बीच ऐसे लोग भी हुए जिन्होंने शिक्षा, साहित्य, इतिहास, पत्रकारिता और प्रकाशन के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई। इसलिए रौनियार समाज के प्रत्येक व्यक्ति, विशेषकर नई पीढ़ी के विद्यार्थियों और युवाओं, को हवलदारी राम गुप्त के बारे में जानना चाहिए।
अब हमारी जिम्मेदारी क्या है?
आज आवश्यकता है कि रौनियार समाज इस महान साहित्यिक विरासत को व्यवस्थित रूप से संकलित करे। इसके लिए—
1. हवलदारी राम गुप्त की विस्तृत जीवनी का दस्तावेजीकरण हो।
2. उनकी सभी उपलब्ध पुस्तकों और रचनाओं को खोजकर सुरक्षित किया जाए।
3. ‘मनोहर पोथी’ के पुराने संस्करणों को डिजिटल रूप में संरक्षित किया जाए।
4. उनके जन्मस्थान पर स्मृति-चिह्न अथवा स्मारक स्थापित करने का प्रयास हो।
5. उनकी जयंती पर साहित्यिक एवं शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएं।
6. रौनियार समाज की पत्रिका, स्मारिका या वेबसाइट में उनके जीवन और साहित्य को स्थान दिया जाए।
7. विद्यार्थियों के बीच उनके जीवन पर निबंध, भाषण और प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएं।
8. उनके रौनियार समाज से संबंध की पुष्टि के लिए परिवार, वंशावली, पुराने दस्तावेजों और ऐतिहासिक स्रोतों का व्यवस्थित शोध कराया जाए।
विस्मृति से स्मृति की ओर
इतिहास केवल बड़े राजाओं और युद्धों का नाम नहीं है। इतिहास उन शिक्षकों, लेखकों, पत्रकारों और समाजसेवियों का भी है जिन्होंने चुपचाप समाज को दिशा दी।
हवलदारी राम गुप्त ऐसे ही एक व्यक्तित्व हैं।
जिस व्यक्ति की ‘मनोहर पोथी’ से देश के लाखों बच्चों ने हिन्दी सीखने की शुरुआत की, जिसने लगभग तीन दर्जन पुस्तकों की रचना की, जिसने पलामू के इतिहास को दस्तावेज के रूप में सामने रखा, जिसने हिन्दी और बांग्ला दोनों भाषाओं में साहित्य लिखा और जिसने अपना प्रेस तथा समाचार-पत्र चलाया—ऐसे साहित्यकार को भुला देना हमारी सामूहिक स्मृति की कमी है।
रौनियार समाज के लिए यह समय अपने इतिहास और साहित्यिक विरासत को पुनः खोजने का है। हवलदारी राम गुप्त का जीवन हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए शिक्षा, साहित्य, परिश्रम और समाज के प्रति योगदान की प्रेरणा बन सकता है। आइए, हम अपने समाज की ऐसी धरोहरों को खोजें, उनका दस्तावेजीकरण करें और नई पीढ़ी तक पहुंचाएं। “जिस समाज को अपना इतिहास मालूम होता है, वही अपने भविष्य को बेहतर ढंग से गढ़ सकता है।”
लेखक एवं संकलनकर्ता
अनुप कुमार-वरिष्ठ शिक्षक
सह जिलामहासचिव
रौनियार समाज,JPRVM जिला लातेहार










