बिहार : फिर चुनावी मुद्दा बनेगी 22 सालों से बंद पड़ी चनपटिया शुगर मिल

मीडिया हाऊस न्यूज एजेंसी 9ता.बेतिया: बिहार में बेरोजगारी चरम सीमा पर है. इसको लेकर, जब-जब आवाज उठती है, तो उद्योग धंधे को बढ़ाने की बात होती है. कोरोना महामारी के पहले दौर, यानी लॉकडाउन में लाखों की संख्या में प्रवासी मजदूर वापस प्रदेश लौटे. उस दौरान उद्योग धंधों को शुरू करने के लिए सरकार ने ऐसी बयानबाजी की, जैसे बिहार में एक महीने के अंदर ही फैक्ट्रियां और बंद पड़ी मिल खुल जाएंगी. लेकिन जो 15 साल में ना हुआ, वो बाढ़ और कोरोना की दहलीज पर खड़े बिहार में अब कहां होने वाला था.चुनावी साल हैं, तो जिक्र सरकारी उपेक्षा का शिकार रहीं चीनी मिल का होगा ही. क्योंकि यही तो चुनावी मुद्दा बनती रहीं हैं. बेतिया के चनपटिया शुगर मिल 15 सालों से इसी मुद्दे की आग में जलती रही लेकिन दोबारा खुल ना सकी. श्री सूर्या शुगर मिल चनपटिया की स्थापना 1932 हुई थी. यह बिहार की सबसे पुरानी चीनी मिलों में शामिल थी.
*वादों का क्या हुआ? वो तो टूटने ही थे*
लोकसभा और विधानसभा चुनाव के वक्त यह चीनी मिल चालू करने का हमेशा वादा किया जाता है. लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म होता है. चीनी मिल का मुद्दा ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है. विधानसभा चुनाव के दौरान एफसीआई मैदान में सूबे के वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी चनपटिया चीनी मिल चालू कराने का वादा किया था. 2019 के लोकसभा चुनाव में नेताओं ने अपनी चुनावी सभा में इस फैक्ट्री की चिमनी से धुआं उगलवाने का वादा किया था. यहां के बीस हजार से अधिक किसान परिवारों में एक आस जगी थी लेकिन वह वादा भी छलावा साबित हुआ.
*जर्जर हो चुकी मिल*
चनपटिया चीनी मिल जर्जर हो चुकी है. इसमें लगे उपकरण भी बेकार हो चुके हैं. खंडहर में तब्दील इस मिल पर अगर सरकार और प्रशासन शुरू से ध्यान देते, तो शायद आज बेतिया के 20 हजार किसान खुशहाल होते. यहां काफी हद तक पलायन थमता. मिल अपने गौरवशाली अतीत की छाया मात्र लिए खड़ी है. चीनी मिल के पास लगभग 200 एकड़ बेशकीमती जमीन है. देश मे नए उद्योग की स्थापना के लिए जहां जमीन का घोर संकट है. वही यहां उपलब्ध जमीन यूं ही बेकार पड़ा हुआ है.
*20 हजार किसान प्रभावित*
चनपटिया में श्री सूर्या सुगर मिल वर्क्स के बंद होने के साथ ही चनपटिया प्रखंड के कई गांवों में गन्ना की खेती भी बंद हो गयी. इन सैकडों गांवों के लगभग 20 हजार किसान परिवारों की नकदी फसल छिन गई. साथ ही करीब हजार मजदूरों की नौकरी और दिहाड़ी भी हाथ से छिन गई. ऐसे में ये पलायन ना करते, तो क्या करते









