ओबरा ‘सी’ ताप विद्युत परियोजना: ₹13,000 करोड़ की लागत के बाद भी धरातल पर चुनौतियां
1 वर्ष में मुख्य इकाई ठप, अधिकारियों की चुप्पी से उठते गंभीर प्रश्न

मीडिया हाउस न्यूज एजेन्सी ओबरा (सोनभद्र)-सोनभद्र जिले के ओबरा नगर को देश और प्रदेश में ‘ऊर्जा की राजधानी’ के रूप में जाना जाता है। इसी पहचान को नया विस्तार देने के लिए लगभग ₹13,000 करोड़ से अधिक की विशाल लागत से ओबरा ‘सी’ तापीय परियोजना (1320 मेगावाट) का निर्माण कराया गया था। दक्षिण कोरिया की निर्माण कंपनी ‘दुसान पावर सिस्टम्स इंडिया’ द्वारा वर्ष 2016 में शुरू की गई इस परियोजना की शुरुआती अनुमानित लागत ₹11,000 करोड़ तय थी। हालांकि, तय समय-सीमा में निर्माण कार्य पूरा न हो पाने के कारण परियोजना का बजट बढ़कर ₹13,000 करोड़ से अधिक पहुँच गया।
बीते वर्ष 30 मई 2025 को प्रधानमंत्री द्वारा कानपुर से डिजिटल रूप से इस परियोजना का लोकार्पण कर इसे राष्ट्र को समर्पित किया गया था। लेकिन लोकार्पण के महज एक वर्ष के भीतर ही धरातल पर जो परिस्थितियां बनी हैं, वे इसकी तकनीकी मजबूती और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न चिह्न खड़े कर रही हैं।
हाल ही में समाचार पत्रों में प्रकाशित समाचारों और स्थानीय स्रोतों के अनुसार, ओबरा ‘सी’ की दोनों इकाइयों का उत्पादन अचानक ‘शून्य’ होने की जानकारी सामने आई थी। पड़ताल में पता चला कि 660 मेगावाट क्षमता की पहली इकाई गत 9 जुलाई से ही पूरी तरह ठप पड़ी हुई है। मुख्य नियंत्रण कक्ष का डिजिटल प्रदर्शन अचानक बंद होने, तार अत्यधिक गर्म होने और वाष्पक व परिपथ तंत्र प्रभावित होने के कारण इसे गंभीर मरम्मत की आवश्यकता बताई जा रही है, जिसे ठीक होने में डेढ़ से दो महीने का समय लगने का अनुमान है। वहीं, दूसरी इकाई में भी तकनीकी खराबी आई थी, जिसे आपातकालीन मरम्मत के बाद पुनः चालू कर दिया गया। 1320 मेगावाट क्षमता वाले इस विद्युत संयंत्र की पहली इकाई के लगातार बंद रहने से प्रतिदिन करोड़ों रुपये मूल्य के बिजली उत्पादन का भारी नुकसान दर्ज किया जा रहा है।
संयंत्र के भीतर तकनीकी संकट के साथ-साथ जमीनी स्तर पर संविदा श्रमिकों की स्थिति भी निरंतर गंभीर बनी हुई है। समय पर मजदूरी का भुगतान न होने और मूलभूत सुविधाओं के अभाव के चलते संयंत्र परिसर में कार्य प्रभावित होने और मजदूरों के असंतोष की खबरें आती रही हैं, जिसको लेकर पूर्व में स्थानीय प्रशासन और पुलिस को हस्तक्षेप तक करना पड़ा था। सबसे चकित करने वाली बात यह है कि 9 जुलाई से पहली इकाई के ठप रहने और अरबों रुपये के राजस्व नुकसान के बावजूद परियोजना प्रबंधन या जिम्मेदार अधिकारियों की तरफ से न तो कोई आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी की गई और न ही कोई सूचना पत्र सार्वजनिक किया गया है। यहाँ तक कि ओबरा ताप विद्युत की आधिकारिक अंतरजाल (वेबसाइट) पर भी निविदा आवंटन व सूचनाएं वर्षों पुरानी पड़ी हुई हैं।
इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब धरातल पर कई गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। पहला प्रश्न यह कि ₹13,000 करोड़ की भारी-भरकम लागत से बनी इस राष्ट्रीय परियोजना में महज एक वर्ष के भीतर ही तारों के अत्यधिक गर्म होने और नियंत्रण कक्ष का प्रदर्शन बंद होने जैसी गंभीर खराबी कैसे आ गई, और क्या निर्माण में प्रयुक्त सामग्री की निष्पक्ष तकनीकी जांच कराई जाएगी? दूसरा प्रश्न यह कि तय समय-सीमा से विलंब होने पर परियोजना की लागत बढ़ने और अब सौंपे जाने के एक वर्ष में ही मुख्य इकाई ध्वस्त होने पर निर्माण करने वाली निजी कंपनी ‘दुसान पावर’ पर अनुबंध की शर्तों के तहत क्या कार्रवाई की जा रही है? तीसरा प्रश्न यह कि 9 जुलाई से पहली इकाई के लगातार ठप रहने से हो रहे करोड़ों रुपये के दैनिक वित्तीय नुकसान का उत्तरदायित्व किस पर तय होगा? चौथा प्रश्न यह कि हफ्तों से मुख्य इकाई बंद होने के बावजूद अब तक प्रबंधन द्वारा कोई प्रेस विज्ञप्ति या आधिकारिक स्पष्टीकरण जारी क्यों नहीं किया गया, और सार्वजनिक संवाद से दूरी बनाने के पीछे क्या मंशा है? पांचवां प्रश्न यह कि डिजिटल प्रणाली के दौर में परियोजना की आधिकारिक वेबसाइट पर निविदा और आवश्यक सूचनाओं का अद्यतन वर्षों पुराना क्यों पड़ा हुआ है? और छठा प्रश्न यह कि परियोजना में कार्यरत संविदा श्रमिकों के समयबद्ध बकाया भुगतान और श्रम अधिकारों की नियमित निगरानी के लिए जिम्मेदार विभाग क्या कदम उठा रहा है?









