सोनभद्र उत्तर प्रदेश का दूसरा बड़ा औद्योगिक केंद्र है.! फिर भी मजदूरों की दशा बहुत ही दयनीय है! दिनकर कपूर

डीएम के निर्देश के बावजूद मजदूरों को पंजीकृत नहीं किया गया।
ए के गुप्ता-विशेष वार्ता, मीडिया हाउस न्यूज एजेंसी सोनभद्र-उत्तर प्रदेश सरकार से मान्यता प्राप्त महासंघ यू. पी. वर्कर्स फ्रंट के प्रदेश अध्यक्ष दिनकर कपूर ने जनपद में मजदूरों की समस्याओं व शोषण को लेकर हुई मीडिया हाउस से हुई वार्ता के दौरान कहा कि.!
प्रश्न  – आप सोनभद्र जनपद के मजदूरों के लिए लम्बे समय से आन्दोलन कर रहे हैं । आपकी मांग क्या है ?
उत्तर – संविधान के अनुच्छेद 21 में भारत के हर नागरिक को गरिमापूर्ण जीवन जीने का जो अधिकार दिया गया है उसे मजदूरों को दिलाने के लिए हम प्रयासरत हैं। सोनभद्र उत्तर प्रदेश का दूसरा बड़ा औद्योगिक केंद्र है। यहाँ एशिया का सबसे बड़ा एल्यूमीनियम कारखाना हिण्डालको, आल्ट्राटेक सीमेंट, आदित्य बिरला केमिकल, हाइटेक कार्बन, विद्युत तापीय परियोजनायें, कोयला, गिट्टी, बालू खनन और क्रेशर उद्योग हैं। इन उद्योगों में ठेका मजदूरों की दशा बहुत ही दयनीय है। परमामेन्ट नेचर के काम में बहुत कम मजदूरी पर ठेका मजदूरों से काम कराया जाता है। जबकि ठेका मजदूर कानून 1970 की धारा 10 के तहत ऐसा करना प्रतिबन्धित है। हालत इतनी बुरी है कि मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी का पिछले 4 साल से प्रदेश में रिवीजन नहीं हुआ है। परिणामतः प्रदेश में केंद्र सरकार के सापेक्ष न्यूनतम मजदूरी आधी है। न्यूनतम मजदूरी का भुगतान भी नहीं किया जाता है और अनपरा में तो चार -चार महीने तक मजदूरी न देकर बन्धुआ प्रथा चलाई जा रही है। महिला मजदूरों से मनरेगा से भी कम महज 200 रूपये में मजदूरी कराई जा रही है। इन हालातों को बदलने के लिए हमारा आंदोलन है।
प्रश्न – सोनभद्र में आए दिन दुर्घटनाओं में मजदूरों की मौत होती रहती है, इस के बारे में  आपका क्या कहना है?
उत्तर – देखिए सोनभद्र में स्थापित ज्यादातर उद्योग कारखाना अधिनियम के तहत खतरनाक उद्योग की श्रेणी में आते हैं। इनमें से विशेषकर तापीय परियोजनाओं और खनन व क्रशर उद्योग में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया जाता है। हाल ही में एनटीपीसी में एक मजदूर की ऊंचाई से गिरकर मौत हो गई। खनन क्षेत्र में मजदूरों की मौतें लगातार होती रहती हैं। अनपरा व ओबरा तापीय परियोजना में दुर्घटनाओं में मजदूर घायल होते हैं और असमय मरते हैं । दरअसल यहां भी मजदूरों  के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। सुरक्षा के सम्बंध में जो नियम कानून बने हैं उनको लागू करने के प्रति आपराधिक लापरवाही बरती जा रही है। उदाहरण आप देख सकते हैं: माइंस सेफ्टी एक्ट के तहत पत्थर खनन में ब्लास्टिंग के कार्य में एक्सपर्ट व्यक्ति को रखा जाना चाहिए लेकिन यहां के माइन्स में वह लोग नहीं है। सामान्य सुरक्षा उपकरण हेलमेट, ग्लबस, मास्क, जूता, सेफ्टी बेल्ट, जाल आदि मजदूरों को उपलब्ध नहीं होते हैं । उत्तर प्रदेश भवन एवं निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड के अंतर्गत खनन के श्रमिक भी आते हैं । श्रम बंधु की बैठकों में कई बार इनके पंजीकरण के सवाल को उठाने और डीएम के निर्देश के बावजूद मजदूरों को पंजीकृत नहीं किया गया। इस सवाल को हमने शासन में भी उठाया है और मजदूरों की जीवन सुरक्षा के लिए हाईकोर्ट में भी दखल दिया  है।
प्रश्न  -यहां बड़ी संख्या असंगठित मजदूरों की है उनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए आपके क्या प्रयास है?
उत्तर – सोनभद्र, मिर्जापुर और नौगढ़ के दलित आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र की आधी से ज्यादा आबादी मजदूर वर्ग में आती है। इनमें ठेका व खनन मजदूर के अलावा बड़ी संख्या ग्रामीण, मनरेगा, निर्माण, घरेलू उद्योग, आंगनबाड़ी, आशा, मिड-डे-मील रसोइया, घरेलू कामगार और रिक्शा चालक व पटरी दुकानदारों की है। यह सभी मजदूर कोरोना महामारी के बाद सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बने ई-श्रम पोर्टल पर दो साल पहले पंजीकृत किए गए थे। लेकिन सरकार ने इन असंगठित मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए कोई योजना नहीं बनाई। जबकि देश की संसद ने 2008 में इनकी सामाजिक सुरक्षा के लिए केन्द्रीय कानून बनाया है। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद 2016 में नियमावली बनी जिसे आज तक लागू नहीं किया गया। ऐसे में मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रदेश  के 100 से भी ज्यादा संगठनों ने मिलकर साझा मंच बनाया है। सरकार से हर पंजीकृत मजदूर को आयुष्मान कार्ड, प्रधानमंत्री आवास, 5 लाख तक का दुर्घटना बीमा, 5000 रूपया पेंशन, पुत्री विवाह अनुदान आदि देने की मांग की है। इस क्षेत्र में इन मांगों को लेकर अभियान चलाया जा रहा है और राज्यपाल महोदया को सम्बोधित मांग पत्र पर हस्ताक्षर कराए जा रहे हैं। मजदूरों की सामाजिक सुरक्षा के सवाल पर एक बड़े आंदोलन की तैयारी हो रही है।
प्रश्न  – मजदूर आंदोलन बेहद कमजोर हो गया है। इस पर आप क्या कहेंगे?
उत्तर – देखिए 1991 से जो आर्थिक औद्योगिक नीतियां देशी विदेशी कारपोरेट घरानों को मुनाफा देने के लिए बनाई और चलाई गईं उसने मजदूर वर्ग का बड़ा नुकसान किया है। मजदूरों के संविधान प्रदत्त अधिकारों पर हमले किए गए, बढ़ती बेरोजगारी के कारण मजदूरों में असुरक्षा बढ़ गई। आजादी के आंदोलन और उसके बाद मजदूरों के पक्ष में बने कानूनों को एक-एक करके खत्म किया गया। वर्तमान मोदी सरकार ने तो सभी 29 श्रम कानूनों को खत्म करके 4 लेबर कोड बना दिए हैं। जिसमें काम के घंटे 12 कर दिए गए है। इनके लागू होते ही देश के 33 प्रतिशत श्रमिक काम से निकाल दिए जायेंगे। इससे हालत यह हो जायेगी कि श्रमिक उत्पादन करने में अक्षम हो जायेंगे और बड़े पैमाने पर उत्पादन प्रभावित होगा। इसलिए पूरे देश का मजदूर इन लेबर कोडों के विरोध में आंदोलनरत है और अगस्त क्रांति दिवस के अवसर पर 9-10 अगस्त को पूरे देश में विरोध कार्यक्रम हुए हैं।
प्रश्न – ट्रेड यूनियन्स की भूमिका पर आप क्या सोचते हैं?
उत्तर – पूंजीवादी जनतंत्र में ट्रेड यूनियनें एक संस्था के बतौर औद्योगिक शांति कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं। संविधान के अनुच्छेद 19 में दिए अभिव्यक्ति की आजादी और संगठन बनाने के अधिकार के तहत ट्रेड यूनियन्स काम करती हैं। वे मजदूरों की समस्याओं को चिन्हित कर पूंजीपतियों, प्रबंधन, शासन, प्रशासन के समक्ष  मांगों के रूप में उठाती हैं और उनका लोकतांत्रिक समाधान कराने की कोशिश करती हैं। लेकिन अब उनका स्पेस और बारगेनिंग क्षमता बेहद कमजोर हो गई है। सरकार भी दमन के रास्ते पर है, सामान्य लोकतांत्रिक गतिविधियों की भी इजाजत नहीं दी जा रही है। हाल ही में बिजली मंत्री के समक्ष हुए समझौते को लागू कराने की मांग पर हुए बिजली कर्मचारियों के आंदोलन पर प्रदेश में दमन ढाया गया। 3000 संविदा श्रमिकों को नौकरी से निकाल दिया गया, इंजीनियरों और कर्मचारियों को सस्पेंड किया गया, उनके वेतन व पेंशन की कटौती की गई और मुकदमें कायम कर उनके ऊपर गिरफ्तारी की तलवार लटका दी गई है। ऐसी परिस्थितियों में मजदूर आंदोलन को राजनीतिक गतिविधि तेज करनी होगी। इस या उस पूंजीवादी दल के पीछे भागने की जगह अपनी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत बनानी होगी और अपने को संगठित करते हुए समाज के हर उत्पीड़ित तबके की गोलबंदी करनी होगी। मुझे उम्मीद है कि आने वाले समय में मजदूर वर्ग लोकतांत्रिक राजनीति को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाएगा।

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