झारखंड में बायो फ्लाक और केज कल्चर से मछली पालन बना लाभदायक व्यवसाय

रांची
मधुसूदन दास पिछले दस सालों से मछली पालन कर रहे हैं। पहले पारंपरिक विधि से मछली उत्पादन करते थे। एक एकड़ तालाब में मात्र दो-तीन क्विंटल तक ही उत्पादन होता था और इससे हर महीने पांच-छह हजार की औसत आमदनी होती थी। लेकिन मत्स्य विभाग से प्रशिक्षण के बाद सघन मछली उत्पादन कर रहे हैं।
अब बायो फ्लाक विधि से तालाब में पंगस व तेलपिया मछली का उत्पादन कर रहे हैं। हमारे यहां कुल आठ से दस लोग काम भी कर रहे हैं। मछली उत्पादन से लेकर मछली को बाजार तक पहुंचाने का काम कर रहे हैं।
झारखंड में मछली किसानों की संख्या 174605
मधुसूदन कहते हैं, पिछले दस सालों में काफी बदलाव आया है और हमसे प्रेरित होकर भी कोडरमा में लोग रोजगार का एक नया विकल्प बनाए हुए हैं। मधुसूदन अकेले नहीं हैं। रातू रोड से लेकर आसपास इलाकों में लोग मछली का उत्पादन कर रहे हैं। मत्स्य निदेशालय के निदेशक अमरेंद्र कुमार ने बताया कि अभी झारखंड में मछली किसानों की संख्या 174605 हो गई है।
मछली बीज उत्पादन भी बढ़ा
मछली बीज उत्पादन में भी झारखंड तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2010-11 में 67.97 करोड़ मछली बीज का उत्पादन हो रहा था। 2011-12 में 97.19 करोड़ तक पहुंचा। 2016-17 में 415 करोड़ था और अगले साल 2017-18 में दोगुना से पार कर 1033 करोड़ पहुंच गया। अभी 2025-26 में यह 1275 करोड़ मछली बीज का उत्पादन पहुंच गया। इस तरह झारखंड मछली बीज उत्पादन में भी तेजी से आत्मनिर्भर हो रहा है।
चार लाख मीट्रिक टन तक पहुंचा उत्पादन
2010-12 में 0.72 लाख मीट्रिक टन मछली का उत्पादन हो रहा था। इस साल अभी तक 3.81 लाख मीट्रिक टन हो चुका है। पिछले साल 4.10 लाख मीट्रिक टन उत्पादन हुआ। अब उत्पादन में तेजी से झारखंड बढ़ रहा है। नीली क्रांति से किसान भी मालामाल हो रहे हैं
2024-25- 3.63 लाख मीट्रिक टन
2023-24- 3.10 लाख मीट्रिक टन
2022-23- 2.80 लाख मीट्रिक टन
2021-22-2.57 लाख मीट्रिक टन
2020-21-2.38 लाख मीट्रिक टन
2019-20- 2.23 लाख मीट्रिक टन
2018-19-2.08 लाख मीट्रिक टन
2017-18-1.90 लाख मीट्रिक टन
2016-17- 1.45 लाख मीट्रिक टन
2015-16-1.15 लाख मीट्रिक टन
2014-15-1.06 लाख मीट्रिक टन
2013-14-1.05 लाख मीट्रिक टन
2012-13-0.97 लाख मीट्रिक टन
2011-12-0.92 लाख मीट्रिक टन
झारखंड में तीन तरह से मछली पालन
झारखंड में तीन तरह से मछली का पालन किया जाता है। एक परंपराग रूप से मछली पालन किया जाता है। इसमें तालाब, डैम आदि में मछली पालन किया जाता है। दूसरा है केज कल्चर। इसे झारखंड ने ही इजाद किया है और अब दूसरे प्रदेश के लोग भी केज कल्चर का अध्ययन करने के लिए रांची आते हैं। यह बड़े तालाब या डैम में आयताकार या वर्गाकार केज बनाकर मछली का पालन किया जाता है।
अब एक नई विधि 'बायो फ्लाक' आई है। इसे आप अपने घर में भी एक टैंक बनाकर मछली का उत्पादन कर सकते हैं। इसमें ऑक्सीजन व मछली के चारे की व्यवस्था ठीक से करनी होती है। तालाब से ज्यादा केज में और केज से ज्यादा बायो फ्लाक में मछली का उत्पादन अब किया जा रहा है।
झारखंड में पिछले छह सालों में मछली उत्पादन में क्रांतिकारी परिर्वतन आए हैं। झारखंड से देश को केज से मछली पालन की विधि बताई और अब बायो फ्लाक विधि से भी झारखंड के किसान तेजी से मछली पालन कर रहे हैं। किसानों को जोड़ने और उन्हें प्रशिक्षित करने को लेकर मत्स्य निदेशालय सचेत है। सरकार भी मदद कर रही है। – अमरेंद्र कुमार, निदेशक, मत्स्य निदेशालय, रांची










