'हिंदुस्तानी संगीत का राजा' जिसने शास्त्रीय गायन के रंग को और निखारा

नई दिल्ली, 24 अगस्त (आईएएनएस)। भारत का संगीत, यहां की संस्कृति और सभ्यता इतनी समृद्ध है कि इसका मुकाबला दुनिया के किसी देश के संगीत, संस्कृति और सभ्यता में करने की क्षमता नहीं है। हमारे वेदों से निकला देश का संगीत सात समंदर पार भी लोगों के दिलों में बसता है। 24 अगस्त, 1917 को किराना घराने में एक ऐसा बच्चा पैदा हुआ जिसके बारे में किसी ने सोचा भी नहीं था कि वह एक दिन ‘हिंदुस्तानी संगीत का राजा’ कहलाएगा।

इस बच्चे का नाम रखा गया बसवराज राजगुरु। बसवराज जिस परिवार में पैदा हुए वह संगीत, ज्योतिष और शिक्षा के क्षेत्र में पहले से ही नाम स्थापित किए हुए था। उन्होंने अपनी संगीत साधना से तब के शास्त्रीय संगीत धुरंधर पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर और कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी और गंगूबाई हंगल के बीच अपने आप को स्थापित कर लिया।

बसवराज राजगुरु के बारे में कहा जाता है कि उन्हें लगभग 40 रागों का व्यापक ज्ञान था। एक तो संगीत की कड़ी साधना में रमे बसवराज राजगुरु और ऊपर से उनके सिर पर गुरु के रूप में उनके पिता जो एक प्रसिद्ध कर्नाटक संगीतकार थे का हाथ, फिर क्या था यह फूल निखर उठा उसके रंग सुर्ख और सुर्ख होते चले गए। 13 साल की छोटी उम्र में पिता का साया उनके सिर से उठ गया तो उन्होंने सवाई गंधर्व, सुरेश बाबू माने, उस्ताद वहीद खान और उस्ताद लतीफ खान जैसे दिग्गजों से संगीत का प्रशिक्षण लिया।

साल था 1940 का जब तक देश के हर कोने में बसवराज राजगुरु के संगीत साधना की खुशबू पहुंच चुकी थी। उनको प्रसिद्धि मिल गई थी। देश भर में उन्होंने कई संगीत कार्यक्रम किए थे। उनके पास गायन की शैली ही अद्भुत नहीं थी बल्कि वह तो 8 से ज्यादा भाषाओं में गा भी सकते थे। लोग उनसे संगीत सीखना चाहते थे।

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कर्नाटक के धारवाड़ की धरती ने बसवराज राजगुरु के रूप में जो हीरा पैदा किया था अब उसकी चमक पूरी दुनिया देख रही थी। एक बार तो भारत-पाकिस्तान सीमा पर दंगाई भीड़ से भी वह बेहद चमत्कारिक तरीके से बच निकले थे। तीन सप्तक में फैली बसवराज राजगुरु की आवाज उम्र के साथ और ज्यादा ठहराव पाती और निखरती गई। इस आवाज को किराना, पटियाला और ग्वालियर तीन घरानों ने मिलकर तराशा जो था तभी तो यह हीरा इतना चमक रहा था।

धारवाड़ की धरती ने बसवराज राजगुरु जैसा हीरा एक नहीं पैदा किया उसके खदान से तो भीमसेन जोशी, गंगूबाई हंगल, मल्लिकार्जुन मंसूर, कुमार गंधर्व जैसे असाधारण, अप्रतिम कलाकार रूपी हीरे बाहर निकले। इन्हीं में से पंडित मल्लिकार्जुन मंसूर और कुमार गंधर्व के साथ पंडित बसवराज राजगुरु ने संगीतकारों की धारवाड़ त्रिमूर्ति का गठन किया था।

1975 में बसवराज राजगुरु को पद्मश्री और 1991 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया। साल था 1991 का जब बसवराज विमान में अमेरिका जाने के लिए सवार होने वाले थे तभी उन्हें दिल का दौरा पड़ा और ‘हिंदुस्तानी संगीत के राजा’ की आवाज हमारे बीच से विदा हो गई।

–आईएएनएस

जीकेटी/

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