कर्नाटक पुलिस माइक्रोफाइनेंस कंपन‍ियों का कर रही सहयोग : आर अशोक

मंड्या, 6 फरवरी (आईएएनएस)। कर्नाटक में विपक्ष के नेता आर. अशोक ने गुरुवार को आरोप लगाया कि कर्नाटक पुलिस राज्य में लोगों को परेशान करने वाले माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का सहयोग कर रही है।

अशोक ने दावा किया, “माइक्रोफाइनेंस संस्थानों के उत्पीड़न के कारण गरीब लोगों की मौत के बावजूद मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने इस मुद्दे पर आंखें मूंद ली हैं।”

अशोक ने आरोप लगाया कि पुलिस भी माइक्रोफाइनेंस संस्थानों का सहयोग कर रही है। उन्होंने दावा किया, “जब ये कंपनियां घरों पर कब्जा कर लेती हैं, तो पुलिस परिवार के सदस्यों को सुरक्षा देने के बजाय उन्हें जबरन बेदखल कर देती है। यह अस्वीकार्य है।”

अशोक ने इन संस्थाओं के दबाव के कारण अपनी जान गंवाने वालों को न्याय सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक जांच की भी मांग की है। उन्होंने मांड्या के कोन्नापुरा गांव में एक पीड़ित परिवार से मुलाकात की, जिन्होंने माइक्रोफाइनेंस ऋण उत्पीड़न के कारण (मां-बेटे ने) आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने शोक संतप्त परिवार को सांत्वना दी।

भाजपा नेता ने मीडिया से बात करते हुए, “सीएम सिद्दारमैया ने माइक्रोफाइनेंस कंपन‍ियों के उत्पीड़न को रोकने के लिए अध्यादेश लाने का वादा किया था, जिसे एक महीना हो गया है। अकेले मांड्या जिले में छह दलित परिवारों को अपने घरों से भागने के लिए मजबूर होना पड़ा। पूरे राज्य में लाखों लोग इसी तरह के मुद्दों के कारण अपने गांव छोड़ चुके होंगे। सरकार अध्यादेश को लागू करने में विफल रही है, और परिणामस्वरूप आत्महत्याएं बंद नहीं हुई हैं।”

उन्होंने बताया कि कोन्नापुरा में एक मां प्रेमा और उसके बेटे रंजीत ने झील में कूदकर अपनी जान दे दी। वे अपना माइक्रोफाइनेंस ऋण चुकाने में असमर्थ थे। उन्होंने कहा, “गरीबों के हितैषी होने का दावा करने वाले मुख्यमंत्री ऐसी त्रासदियों पर चुप रहे हैं। कोन्नापुरा में चामुंडेश्वरी, नवचेतना, सूर्योदय, यूनिटी और प्रगति समेत 24 माइक्रोफाइनेंस संस्थान 12 प्रतिशत की वार्षिक ब्याज दर पर पैसा उधार दे रहे हैं। प्रत्येक उधारकर्ता के पास नौ गारंटर होते हैं। यदि कोई व्यक्ति ऋण चुकाने में विफल रहता है, तो बाकी गारंटरों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। दबाव को सहन करने में असमर्थ होकर लोग आत्महत्या कर रहे हैं।”

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उन्होंने कहा कि मांड्या में 60 माइक्रोफाइनेंस संस्थाएं कार्यरत हैं, लेकिन उनमें से केवल 18 ही कानूनी रूप से पंजीकृत हैं।

–आईएएनएस

एफजेड/सीबीटी

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