विकास की राख में सिसकती रेणुका – कब जागेगा तंत्र

मीडिया हाउस ओबरा (सोनभद्र) – औद्योगिक प्रगति की अंधी दौड़ अक्सर उन प्राकृतिक संसाधनों को ही अपना ग्रास बना लेती है, जिनके दम पर मानव सभ्यता फलती-फूलती है। ओबरा की रेणुका नदी आज इसी संकट के मुहाने पर खड़ी है। वर्षों से तापीय विद्युत परियोजना की राख (फ्लाई ऐश) जिस तरह सीधे नदी के सीने में घोली जा रही है, वह न केवल पर्यावरण नियमों का खुला उल्लंघन है, बल्कि एक समूची पारिस्थितिकी (Ecosystem) की हत्या जैसा है। हाल ही में ‘सोन चेतना सामाजिक संगठन’ की सक्रियता और तहसील दिवस पर दी गई शिकायत के बाद प्रशासनिक अमले का धरातल पर उतरना एक सकारात्मक संकेत तो है, लेकिन सवाल वही है कि क्या यह केवल ‘निरीक्षण’ तक सीमित रहेगा या कुछ ठोस परिणाम भी निकलेंगे
नियमों की धज्जियाँ और व्यवस्था की खामोशी भारतीय पर्यावरण कानून और ‘जीरो लिक्विड डिस्चार्ज’ की नीति स्पष्ट कहती है कि किसी भी औद्योगिक अपशिष्ट को बिना उपचार के प्राकृतिक जल स्रोतों में नहीं छोड़ा जा सकता। इसके बावजूद, ओबरा में नियमों को राख के नीचे दबा दिया गया है। जब प्रशासनिक टीम—जिसमें एसडीएम, तहसीलदार और लेखपाल शामिल थे—धरातल पर पहुँची, तो आँखों के सामने नदी का दम घुटते हुए देखा गया। किसी भी परियोजना के लिए आर्थिक लाभ जनस्वास्थ्य और पर्यावरण से बड़ा नहीं हो सकता, फिर नियमों के इस घोर विरोध पर अब तक चुप्पी क्यों
बंजर होती जमीन और दम तोड़ते बेजुबान इस प्रदूषण का सबसे दुखद पहलू इसका मानवीय और प्राकृतिक पक्ष है। ग्रामीण क्षेत्रों के किसान, जिनकी आजीविका का एकमात्र साधन उनकी जमीन है, आज अपनी मिट्टी को बंजर होते देखने के लिए विवश हैं। राख युक्त पानी ने मिट्टी की गुणवत्ता को इस कदर प्रभावित किया है कि खेती अब घाटे का सौदा बन गई है। बेजुबान मवेशी और जलीय जीव इस ‘जहरीले’ होते पानी के कारण असमय काल के गाल में समा रहे हैं। पशु-पक्षियों का यह मौन रुदन शायद ही फाइलों में दर्ज हो पाए, लेकिन धरातल पर इसके परिणाम भयावह हैं।
जिम्मेदारी की कसौटी पर प्रशासन अधिकारियों ने मौके पर पहुँचकर स्थिति की गंभीरता को समझा है और संबंधित कार्य की जिम्मेदारी देख रहे फर्मों के बारे में जानकारी ली है। अब समय केवल जानकारी जुटाने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने का है। यदि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस ‘धीमे जहर’ को रोकने के लिए कड़े कदम नहीं उठाते, तो भविष्य में पीने के पानी और शुद्ध हवा के लिए संघर्ष और भी विकराल हो जाएगा।










